Thursday, August 14, 2008

आजादी के नाम पर...

सभी आजाद रहना चाहते हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि आजादी की सबकी परिभाषा अलग-अलग है। संभव है कि जहां से किसी की आजादी शुरू होती हो, वहां किसी के लिए इसका अंत हो रहा हो, लेकिन हम इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं। हमने इतने स्वतंत्रता दिवस मना लिए, लेकिन सच यही है कि ज्यादातर लोग आज भी आजादी को गलत अर्थों में ही ले रहे हैं:

जिन लोगों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी और सचमुच में आजादी क्या होती है, इसे शिद्दत से महसूस किया था, अगर उन चुनिंदा बचे- खुचे लोगों से आप बात करें, तो पाएंगे कि वे देश में ब्रिटिश शासन की वापसी चाहते हैं। उन्हें देश का आज का रंग-ढंग कुछ रास नहीं आ रहा। वे चाहते हैं कि जो अनुशासन अंग्रेजों के समय में था, वह फिर से देश में वापस आए। आजादी के नाम पर आज जिस तरह से सब कुछ बेलगाम है, वह उनसे सहा नहीं जाता।


वैसे, उन लोगों का दर्द समझा भी जा सकता है। आज लोग हर वह काम कर रहे हैं, जो वे करना चाहते हैं और यह सब कुछ हो रहा है आजादी के नाम पर। व्यक्तिगत आजादी के नाम पर वे दूसरों की स्वतंत्रता छीन रहे हैं, बोलने की आजादी के बहाने वे दूसरों को बोलने से रोक रहे हैं, लोकतांत्रिक तरीके से विरोध के नाम पर वे क्षेत्रवाद को हवा दे रहे हैं, धार्मिक आजादी के नाम पर आतंक को आसरा दे रहे हैं, तो राजनीतिक अधिकारों का दुरुपयोग अरबों का बैंक बैलेंस बनाने में हो रहा है। शायद यही चीज उन्हें इस बात के लिए विवश करती है कि वे अंग्रेजी हुकूमत की वकालत करें।

आजादी यानी डिप्रेशन और स्यूसाइड


आजादी का मतलब किसी एक तरह की आजादी से नहीं है, लोगों को हर तरह की आजादी चाहिए। कोई किसी नियम-कानून में बंधना ही नहीं चाहता, चाहे वे सामाजिक नियम हों या सरकारी कायदे कानून। प्रैक्टिकल स्थिति यह है कि जो मनमर्जी नहीं कर पाता, वही अपने को गुलाम समझने लगता है और फिर शुरू होती है उससे मुक्त होने की कवायद। इस कवायद में लोग बागी हो रहे हैं। वे परिवार से बगावत कर रहे हैं, समाज छोड़ रहे हैं, सरकारी कानूनों से खेल रहे हैं और यहां तक कि अपनी आजादी के सामने देश की भी परवाह नहीं करते। जो ऐसा कर रहे हैं, वे दूसरों के लिए दुश्मन बन रहे हैं, लेकिन जो ऐसा नहीं कर रहे, वे खुद अपने दुश्मन बन रहे हैं।


आजादी की चाह में इंसान दिनोंदिन कमजोर होता जा रहा है। दरअसल, जो व्यक्ति बड़ी शिद्दत से आजादी चाहता है, लेकिन उसे हासिल नहीं कर पाता, वह खुद को मिटा डालना चाहता है या अपनी मानसिकता बीमार कर बैठता है। परिणाम यह है कि आत्महत्या का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है, तो डिप्रेशन की वजह से समाज का एक बड़ा तबका बीमार हो रहा है। आप यह कह सकते हैं कि समाज तब से ज्यादा बीमार रहने लगा है, जब से लोगों में आजादी की चाह तेजी से हिलोरें मारने लगी हैं और जब से लोगों ने आजादी को अपने जीने-मरने से जोड़ लिया है।

पर्सनल स्पेस की डिमांड

लोग जहां पहले एक-दूसरे से जुड़कर रहना चाहते थे, वहीं अब वे अलग रहना चाहते हैं। इतना अलग कि कोई यह न पूछे कि अभी क्या कर रहे हो। और इसे नाम दिया गया है कि पर्सनल स्पेस का। यह पर्सनल स्पेस आज पारिवारिक कलह की सबसे बड़ी वजह है। मियां-बीवी, पैरंट्स-बच्चे, भाई-बहन जैसे तमाम रिलेशंस पर्सनल स्पेस की बढ़ती मांग की वजह से कमजोर होते जा रहे हैं। वेस्ट ने तो पर्सनल स्पेस से होने वाली क्षति के साथ जीना सीख लिया है, लेकिन भारतीय समाज को इसने बिखेर कर रख दिया है।

इस पर्सनल स्पेस ने लोगों में एक किस्म की उच्छृंखलता पैदा की है, जिससे तलाक की संख्या बढ़ रही है और विवाह संस्था छिन्न- भिन्न हो रही है, तो बड़े-बूढ़ों को सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल रही। बच्चे अब बूढ़े पैरंट्स को अपने साथ रखना नहीं चाहते, क्योंकि वे बच्चों की पर्सनल स्पेस का खयाल नहीं करते। जाहिर है, इस पर्सनल किस्म की आजादी ने देश के सामने एक बड़ी चुनौती रख दी है और यह चुनौती है अनाथ बच्चों व बूढ़ों को सहारा देने के लिए जल्दी से जल्दी एक राष्ट्रीय नीति पर काम शुरू करने की। यही नहीं, तलाक की बढ़ती संख्या ने तलाक कानून को और लचर बनाने की जरूरत भी पैदा की है।

कमजोर कर रही है आजादी

एक आजाद मुल्क हर तरह से मजबूत होता है, लेकिन सभी यह मान रहे हैं कि हम लगातार कमजोर हो रहे हैं। देश की छवि आजाद देश से ज्यादा एक सॉफ्ट नेशन की हो गई है। यही वजह है कि लोग मनमौजी हो रहे हैं। हम सिर्फ अधिकारों की बात करते हैं, कर्त्तव्यों की परवाह नहीं करते। हम यह नहीं देखते कि हमारी आजादी से दूसरों की आजादी कितनी छिन रही है। आज मदरसे, चर्च और तमाम हिंदू संगठन कट्टरपंथ को बढ़ावा देने में लगे हैं और यह सब हो रहा है धार्मिक आजादी के नाम पर। देश अपनी ही आबादी के भार से दबा जा रहा है, लेकिन धर्म की आड़ में लोग फैमिली प्लानिंग से तौबा कर रहे हैं। पोलियो वैक्सीनेशन अभियान भी इसी कथित आजादी के नाम पर फ्लॉप हो रहे हैं। जाहिर है, लोग अपने और अपने विश्वास की आजादी के सामने देश व समाज की चिंता बिल्कुल नहीं कर रहे।

खोखला हुआ सरकारी तंत्र

आजादी का गलत अर्थ कितना गलत होता है, इसे हम अपने देश के सरकारी तंत्र के ढहने के रूप में देख सकते हैं। सरकारी कर्मचारियों ने इतनी ज्यादा आजादी ले ली कि देश का सारा सिस्टम ही बिखर गया। कर्मचारियों की मनमौजी की वजह से जनता के पैसे से बनीं तमाम सरकारी कंपनियों का दीवाला निकल गया, तो कुछ कंपनियां बंद होने के कगार पर पहुंच गईं और बिकने भी लगीं। प्राइवेट हाथों में अब वही कंपनियां मुनाफे की फसल काट रही हैं।

Monday, May 12, 2008

महिमा सफेद हाथियों की!

जमाना सफेद हाथियों का है। हमरे खयाल इस निराली दुनिया के ऊ सबसे नायाब जीव हैं औरो महिमा ऐसन देखिए कि देश में आजकल ऊ काले हाथियों से बेसी पाए जाते हैं। काले हाथी भले लुप्तप्राय हो रहे हों, लेकिन सफेद हाथियों की हस्ती मिटाए नहीं मिटती।

अपने देश में तो हालत कुछ ऐसन है कि कंपनियां पहिले सफेद हाथियों को नौकरी पर रखती है औरो फिर उन घोड़ों के बारे में सोचती है, जिनके भरोसे उनका काम धाम चलेगा। शायद इसकी वजह ई है कि उन्हें सफेद हाथी के 'हाथीत्व' पर कुछ बेसिए भरोसा होता है। वैसे, महंगे सफेद हाथियों का काम होता बहुते आसान है-बस कोड़ा फटकारते रहो... जो काम कर रहा है, उससे औरो काम करवाते रहो। सफेद हाथियों की पहचाने यही है। एक तरफ तो ऊ काम करने वालों को जेतना हो सके प्रताडि़त करते रहते हैं, दुत्कारते फटकारते रहते हैं, ताकि ऊ बेसी से बेसी काम करे, तो दूसरी तरफ काहिलों से उन्हें घनघोर सहानुभूति रहती है।

दरअसल, ऊ जानते हैं कि काम करने वालों से आप बस काम करवा सकते हैं, चमचागिरी उनके वश की बात नहीं होती, तो दूसरी तरफ काहिल बस चमचागिरी कर सकते हैं, काम करना उनके वश की बात नहीं होती। ऐसन में काहिलों को पटाकर रखना उनकी मजबूरी होती है, काहे कि उनकी मौजूदगी से सफेद हाथियों के जीवन में रस बना रहता है, उनका ईगो बूस्ट होता रहता है। सफेद हाथियों की परंपरा कभियो खतम नहीं होती, तो इसके पीछे भी अपने कारण हैं।

असली दिक्कत ई है कि अपने देश में हाथी बनने का रास्ता अभियो घोड़ों की बस्ती से ही गुजरता है। जब तक घोड़े सफेद हाथियों के अंदर दसियों साल तक काम न कर लें, ऊ हाथी बनने के काबिल नहीं माने जाते। ऐसन में जब तक कौनो घोड़ा हाथी बनने के काबिल होता है, ऊ सफेद हाथियों से एतना त्रस्त हो चुका होता है कि काला हाथी बनने के बजाय सफेद हाथी बनना ही मुनासिब समझता है। ऐसन में सफेद हाथियों की परंपरा सतत कायम रहती है।

गौर करने वाली बात इहो है कि अक्सर काहिले लोग सफेद हाथी के पोस्ट तक पहुंच पाते हैं, जबकि काबिल लोग टापते रह जाते हैं। होता ई है कि अपनी काहिली की वजह से सुस्त घोड़ों को पहिलये से पता रहता है कि सफेद हाथियों की बटरिंग ही उनकी नैया पार लगा सकती है, जबकि काबिल लोग इस मुगालते में मारे जाते हैं कि ऊ अपनी काबिलियत से हाथी बन जाएंगे।

वैसे, हाथी औरो उसमें भी सफेद हाथी पालना बड़े-बड़े लोगों का शौक होता है। आईपीएल को ही लीजिए। अरबपतियों ने अपनी अपनी टीमों के लिए एक-एक सफेद हाथी पहिलये चुन लिया औरो उनको नाम दिया गया आइकन पिलयर! माना गया कि चूंकि भारतीयों को अजीब जीवों को देखने के लिए मजमा लगाना अच्छा लगता है, इसलिए इन सफेद हाथियों को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आएंगे... सब काम धाम छोड़कर स्टेडियम आएंगे।

किरकेट कंटरोल बोर्ड के सिलेक्टरों की दूरदृष्टि देखिए कि उनके सभी आइकन पिलयर एक एक कर वास्तव में सफेद हाथी साबित हो रहे हैं! अब ई तो शोध की बात है कि लोग वाकई इन्हीं सफेद हाथियों को देखने मैदान पर आ रहे हैं या फिर जो घोड़ा सब बॉल औरो बैट से बढि़या परदरशन कर रहे हैं, उनको देखने?

बहरहाल, जब तक देश में 'सरकारी संस्कृति' कायम है, फैदा इसी में है कि आप भी सफेद हाथियों की जय जयकार करते रहिए! अस्तित्व बचा रहेगा तो कभियो न कभी आप भी सफ़ेद हाथी बनकर दुनिया से मौज ले सकेंगे.

Saturday, May 03, 2008

बहुते जालिम है दुनिया

दुनिया बहुते जालिम है। आप कुछो नहीं कीजिए, तो उसको पिराबलम, कुछो करने लगिए, तभियो पिराबलम! आखिर दुनिया को चाहिए का, कोयो नहीं जानता। औरो जब तक जानने की स्थिति में होता है, बरबाद हो चुका होता है।

जब तक आम भारतीयों को दोनों टैम रोटी-नून नहीं मिलता था, गरीब देश कह-कहके पश्चिमी देशों ने उसके नाक में दम कर रख था। अब जाके स्थिति सुधरी औरो कुछ लोग भरपेट खाना खाने लगे, तो अब फिर से अमेरिका के पेट में दरद की शिकायत हो गई है। अब अमेरिकी विदेश मंतरी कहने लगी हैं कि भारतीय एतना भुक्खड़ हैं कि टन का टन अन्न चट कर जाते हैं। ऊ एतना खाते हैं कि दुनिया से अन्न खतम होने लगा है। गनीमत है, अभी तक अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र में भारतीयों को एक शाम उपवास पर रखने का बिल नहीं पास करवाया है। का पता एक दिन ऐसनो दिन देखना पड़े, आखिर ऊ महाशक्ति है भाई।

हालांकि, गनीमत तो इहो है कि अभी तक उनको भारत में आदमियों के पैदावार पर बेसी आपत्ति नहीं है! जिस दिन उसको आपत्ति हो जाएगी, यकीन मानिए भारत सरकार उसके आदेश का वैसने खयाल रखेगी जैसन उसने चीनी ओलिंपिक मशाल का रखा। एक दिन में सबकी नसबंदी हो जाएगी औरो अरब तक जनसंख्या पहुंचा देने वाला 'भारतीय कुटीर उद्योग' पूरी तरह बंद हो जाएगा!

वैसे, भारत की गरीबी का मजाक उड़ाने में अमेरिकिए आगे नहीं है। अभिये कुछ दिन पहिले एक ठो केंद्रीय मंतरी ने कहा कि चूंकि उत्तर भारतीय भी अब गेहूं खाने लगे हैं, इसलिए देश में अन्न की कमी हो गई है। अब बताइए, उत्तर भारतीयों को रोटी खाना बंद कर देना चाहिए?

दुनिया के सताए लोग और भी हैं। बेचारे हरभजन सिंह को ही लीजिए। दुनिया ने बेचारे को कहीं का नहीं छोड़ा। पहले तो दुनिया उसको झाड़ पर चढ़ाती रही कि बोलर को एग्रेसिव होबे करना चाहिए, उसे साइमंड्स की ऐसी तैसी करनी ही चाहिए। औरो ऑस्ट्रेलिया में बहादुरी दिखाने के बाद जब उस बेचारे ने आईपीएल में श्रीशांत को लपड़ा दिया, तो उसकी 'बहादुरी' को दाद देने वाला कोयो नहीं था। आज सब उसके एग्रेसन की आलोचना कर रहे हैं। बेचारा भज्जी!

कुछ ऐसने हाल किया है दुनिया ने करीना कपूर का भी। जब तक ऊ शाहिद कपूर के साथ थी, बेचारी को दुनिया ने चैन से जीने नहीं दिया। लोग कहते थे कि चालाक करीना एक 'मासूम' का शोषण कर रही है। बेचारी ने जब उस 'बाल शोषण' से तौबा करनी चाही, तो सहारे के लिए कंधा भी तलाशा। अब कोयो हमउमर वैसन मिलेगा नहीं, तो बुड्ढे हो रहे सैफ का ही सहारा ढूंढ लिया। अब दुनिया को फिर से करीना से ऐतराज है- नैन मटक्का भी कर रही है तो तलाकशुदा दो बच्चे के बाप से। अब दुनिया करीना से पूछ रही है कि सैफ में आखिर उसको मिला का?

हालत तो खराब लोगों की ऑफिस की दुनिया भी कर रही है। कान्फिडेंस नहीं है... काम नहीं कर सकते... जैसन ताना सुनते सुनते बंदा जब अपने में ओवर कान्फिडेंस पैदा कर लेता है, तो बाकियों को लगता है कि ई तो कुछ बेसिए उड़ रहा है। फिर लगते हैं सब उसका पर कतरने, ताकि ऊ उड़िए न पाए। बेचारे चौबे, जो छब्बे बनने का दावेदार होता है, दुनिया उसे दूबे बनाकर ही छोड़ती है!

अब आप ही बताइए दुनिया से निबटा कैसे जाए? दुनिया के कहे पर झाड़ पर चढ़ा जाए या फिर झाड़ के नीचे बैठ के दुनिया देखी जाए?

Saturday, April 26, 2008

काश! हम सठियाये होते

पहले हम बुढ़ापे से डरते थे, लेकिन अब बूढे़ होने को बेकरार हूं। दिल करता है, कल के बजाए आज बूढ़ा हो जाऊं, तो एक अदद ढंग की हसीना हमको भी मिल जाए।

नहीं, हम बेवकूफ नहीं हूं। बूढ़ा हम इसलिए होना चाहता हूं, काहे कि बुढ़ापा अब बुढ़ापा रह नहीं गया है। जीवन के चौथेपन में अब एतना मौज आने लगी है कि वानप्रस्थ की बात अब किसी के दिमागे में नहीं घुसती। विश्वास न हो, तो दुनिया देख लीजिए। लोग जेतना बूढे़ होते जा रहे हैं, जवानी उनमें ओतने हिलोरें मारती जा रही है।

' साठा पर पाठा' बहुत पहिले से हम सुनते आया हूं, लेकिन ई कहावत कभियो ओतना सच होते दिखा नहीं, जेतना अब दिख रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति सर्कोजी से लेकर रूस के राष्ट्रपति पुतिन औरो पके बालों वाले सलमान रुश्दी तक, साठवां वसंत देखने जा रहे तमाम लोगों को ऐसन ऐसन हसीना मिल रही है कि जवान लोग के जीभ में पानी आ रहा है। अब हमरी समझ में ई नहीं आ रहा कि कमियां जवान लोगों में हैं या फिर दुनिया भर की लड़कियों की च्वाइस बदल गई है?

लोग कहते हैं कि बात दोनों हुई हैं। जवान लोग पैसा बनाने के चक्कर में ऐसन बिजी हैं कि उनके दिल में रोमांस का सब ठो कुएं सूख गया है, तो पैसा कमाते-कमाते बूढ़े हो चुके लोग जब ठंडा होने लगे हैं, तो उनमें रोमांस का घड़ा फिर से छलकने लगा है। ऐसन में आप ही बताइए, लड़कियों के पास बूढ़ों के बाल काले करवाने के अलावा औरो कौनो चारा बचता है का?

वैसे, लड़कियां भी कम उदार नहीं हुई हैं। अभिए कुछ दिन पहले करीना को देखकर हमको महसूस हुआ कि लड़कियों की सोच में केतना का फरक आ गया है। सैफ के दो-तीन बच्चों के साथ ऊ ऐसन मगन थीं, जैसे ऊ अपने ही बच्चे हों। कुछ दशक पहले तक सौतेली मां का मतलब यमराज होता था, लेकिन अब दूसरे का बच्चा भी अगर पति के तरफ से गिफ्ट में मिल मिल जाए, तो लड़कियां उनसे मां कहलवाने में गुरेज नहीं करतीं। अब चाहे ऊ बच्चा अपनी ही उमर का काहे नहीं हो।

हालांकि चाहे कुछो कहिए बुढ़ापे में दम तो होबे करता है। औरो ई दम ऐसन नहीं है कि उनमें अभिए आया है। ई हमेशा से रहा है। अंतर बस ई है कि बूढ़ा रोमांस पहले लोक लाज के भय से घूंघट नहीं निकालता था, लेकिन अब जमाने के हिसाब से ऊ बेशरम हो गया है!

बुढ़ापा हमेशा से खतरनाक रहा है, इसका एक ठो बानगी देखिए। बीस साल पहले हमरी एक परिचिता की टीचर अपनी शिष्याओं को नसीहत कुछ ऐसे देती थीं- अगर तुम बस से कहीं जा रही हो औरो बस में तुम्हें कौनो सीट किसी पुरुष के साथ शेयर करनी पड़े, तो बूढे़ आदमी के साथ बैठने के बजाय जवान पुरुष के साथ बैठना, ऊ कम खतरनाक होते हैं! तो ई था बीस साल पहले बूढ़ों का आतंक! अब तो तभियो मामला सेफ है, काहे कि ई आतंक परेम में बदल गया है! सही पूछिए, तो इसीलिए हम सठियाना चाहता हूं!